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भाग-३ केवल 2 रुपये ज्यादा पाने की आशा में किये हुए प्रयोग और उसके नतीजे
सलाहकार लेखएग्रोस्टार एग्रोनोमी सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस
भाग-३ केवल 2 रुपये ज्यादा पाने की आशा में किये हुए प्रयोग और उसके नतीजे
इन सभी समस्याओं के सही समाधान के लिए, किसान भाई, असिंचित और मानसून पर आधारित कृषि करने की बजाय, सिंचित कृषि यानि सालभर खेती करना चुनतें हैं। उसके लिए उन्हें निरंतर सिंचाई स्रोत कीअवश्यकता है। इसलिए वे बोरवेल, कुआं या खेत के तालाबों या लिफ्ट सिंचाई को अपनातें हैं। इन योजनाओं को लागू करने में, किसान भाई विभिन्न कृषि संस्थानों, बैंकों और सरकारी सब्सिडी से कर्ज़ा लेकर फसल चक्रमें बदलाव लाने की कोशिश करते हैं। परिवर्तन से जहाँ नए अवसर मिलते हैं, वहीं नयी समस्याएं भी आती हैं। वर्तमान और अगले लेख में, हम ऐसे अवसरों और चुनौतियों का विश्लेषण करेंगे, जिनका सामना किसान भाई, असिंचित खेती को सिंचित खेती में परिवर्तित करने में करतें है।
सभी किसानों के पास तालाब खेत, ड्रिप सिंचाई, उर्वरक तकनीक व्यवस्था जैसी बेहतर सरकारी सिंचाई योजनाओं के बारे में जानकारी नहीं है, और यदि उनके पास इन योजनाओं को शुरू करने के लिए ज़रूरी निवेश हो भी, तो यह सभी किसानों के लिए यह कर पाना संभव नहीं होता। योजना पूरी तरह लागू होने के बाद ही उन्हें सब्सिडी की राशि मिलती है। इसलिए, केवल वे ही इस तरह की योजनाओं से का लाभ उठा सकते हैं, जिनके पास जमा पूंजी का इंतज़ाम हो। विश्वविद्यालयो और सरकारी कर्मचारियो को इस तरह की विभिन्न योजनाओं के बारे में किसानो को मार्गदर्शन देना चाहिए। किसान पिछले 2-3 वर्षों के बाज़ार मूल्य का अध्ययन करते है, और उसके बाद ही किसी फसल लगाने का निर्णय लेते हैं। और कई किसान तो एक साथ ही सामान फसल उगाने का निर्णय ले डालते हैं। मांग की कमी के परिणामस्वरूप, या ये कहिए कि अधिक आपूर्ति होने के कारण, उस उपज की कीमत गिर जाती है। हाल ही का उदाहरण ले तो, बुवाई के समय आलू की कीमत 1500 रू/ -प्रति क्विंटल थी, और अब जब कटाई का समय आया तो कीमत150 रुपये प्रति क्विंटल हो गयी है। इससे पता चलता है कि मांग और आपूर्ति के गणित, कभी-कभी किसानों के पक्ष में होते हैं और कभी नहीं। अब, मांग और आपूर्ति, दोनों ही किसानों के नियंत्रण से बाहर हैं, इसकी ज़िम्मेदारी सरकार और बाज़ार के संगठनों की है। यदि हम प्याज का उदाहरण ले, तो यह हर साल लोगों रुला देता है, कभी ग्राहकों को भुगतना पड़ता है, तो कभी-कभी किसानों की हालत पतली हो जाती है। खेती की उत्पादन लागत के अनुसार प्याज की बाजार में कीमत 7 रु/- से 9 रु/- होनी चाहिए, पर किसानों को इसे 2रु /- प्रति किलो में बेचकर नुकसान भुगतना पड़ता है। केवल फ़सल के लिए पूंजी निवेश किया जाता है, इससे तो किसानों की खेती की मजदूरी लागत की भी भरपाई नहीं हो पाती। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ज़मीन खरीदने के लिए बहुत अधिक निवेश की ज़रुरत है। वर्तमान बाज़ार दर के अनुसार, भूमि की लागत लगभग 20 लाख रु. प्रति एकड़ तक हो सकती है। किसी उद्योगपति को, किसी भी अन्य व्यवसाय में, इतनी बड़ी राशि निवेश करने पर, कितने मुनाफे की उम्मीद होगी? और यदि कोई किसान उसी तरह की उम्मीद करे, तो इसमे क्या गलत है? क्यों किसान और उसके परिवार के सदस्य उद्योगपति, कर्मचारियों और व्यापारियों जैसे स्वस्थ जीवन पाने की उम्मीद नहीं कर सकते? असल में, यह केवल उन किसानों के लिए ही नहीं जो अपने एक एकड़ खेत पर निर्भर हैं। बल्कि यह खेती मजदूरों, दलालो, व्यापारियों, दुकानदारों, किराने की दुकान के मालिकों, ट्रांसपोर्टर आदि जैसे लोगों की एक लम्बी कड़ी है, जो खेत पर निर्भर होती है। लेकिन यह कड़ी अदृश्य है, इसे कभी भी गिनती में लिया ही नही जाता। यदि कोई व्यापार या उद्योग बंद होने की कगार पर है, तो सरकारी संसाधन उसे मदद करते हैं, ताकि वह बंद न हो जाए। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि, सरकार के पास रिकॉर्ड है कि उस व्यवसाय/उद्योग में कितने मज़दूर काम करते हैं। इसलिए सरकार इतने सारे लोगों के लिए रोजगार खोने का और उनके परिवार को पीड़ित करने का जोखिम नहीं उठा सकती। सरकार पूंजी निवेश प्रदान कर, उन्हें इस स्थिति से उभारने की कोशिश करती है। कृषि के मामले में ऐसे उपाय क्यों नहीं किए जाते? असल में, कृषि को रोज़ी-रोटी के साधन के रूप में देखा जाता है। खेती को अब तक व्यवसाय का दर्जा नहीं मिला है। इसलिए जो किसान कृषि आधारित देश का राजा है और जो सभी को भोजन कराता है, वह खुद असहाय महसूस करता है, और हम उसे कर्ज़ या कर्ज़ छूट के लिए भीख मांगते हुए देखते हैं। किसानों के साथ यह एक-तरफ़ा सलूक, यहीं नहीं समाप्त होता। यदि कोई किसान, किसी वाहन ऋण या निजी ऋण की लेने बैंक में जाता है, तो बैंक उससे नौकरी या व्यवसाय के दस्तावेज़ मांगती है। यदि वह 7/12 दिखाता है, तो उसे ऋण देने से इनकार किया जाता है, या ऋण दर को बदल दिया जाता है। जो ऋण रोज़गार या व्यवसाय करने वाले किसी व्यक्ति को 7-8% प्रतिवर्ष की दर से मिलता है, वही ऋण किसान को 11-12% की दर से प्राप्त होता है। एक तरफ़ बैंक के कर्मचारी कृषि उत्पादन के लिए सस्ती दरों पर खरीदते हैं, और दूसरी ओर, वे किसान को अधिक ब्याज पर ऋण देतें हैं, ताकि वह उस ऋण को चुकाने में सक्षम न हो पाये और ऐसे ऋण को डूबता कर्ज में बदला जा सकें। अधिक जानने के लिए, अगले भाग को भी ज़रूर पढ़ें।
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