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चने की फसल में उकठा रोग का नियंत्रण
गुरु ज्ञानएग्रोस्टार एग्रोनोमी सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस
चने की फसल में उकठा रोग का नियंत्रण
मौसम में बदलाव और बार-बार खेत में एक ही फसल लगाने पर चने की फसल में उकठा रोग लगने की संभावना बढ़ जाती है, ऐसे में किसान सही प्रबंधन अपनाकर इससे छुटकारा पा सकते हैं। चने की फसल में उकठा रोग फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम नामक फफूंद के कारण होता है। यह सामान्यतः मृदा तथा बीज जनित बीमारी है, जिसकी वजह से 10 से 12 प्रतिशत तक पैदावार में कमी आती है। इस रोग का प्रभाव खेत मे छोटे छोटे टुकड़ों मे दिखाई देता है। प्रारम्भ मे पौधे की ऊपरी पतियां मुरझा जाती हैं, धीरे-धीरे पूरा पौधा सूखकर मर जाता है। जड़ के पास तने को चीरकर देखने पर वाहक ऊतकों मे कवक जाल धागेनुमा काले रंग की संरचना के रूप में दिखाई देता है।
रोकथाम:- 1. चना की बुवाई उचित समय यानि 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर तक करना चाहिए। 2. गर्मियों में मई से जून में गहरी जुताई करने से फ्यूजेरियम फफूंद का संवर्धन कम हो जाता है। मृदा का सौर उपचार करने से भी रोग में कमी आती है। 3. पाच टन प्रति हेक्टेयर की दर से कम्पोस्ट का प्रयोग करना चाहिए। 4. बीज को मिट्टी में 8 सेंटीमीटर की गहराई में बुवाई करना चाहिए। 5. चना की उकठा रोग प्रतिरोधी किस्में लगाना चाहिए। 6. उकठा रोग का प्रकोप कम करने के लिए तीन साल का फसल चक्र अपनाया जाना चाहिए। 7. सरसों या अलसी के साथ चना की अन्तर फसल लगाना चाहिए। 8. टेबुकोनाजोल 54% डब्ल्यू/डब्ल्यू एफएस @4.0 मिलीलीटर/10 किलोग्राम बीज के हिसाब से बीजोपचार करें। स्रोत: एग्रोस्टार एग्रोनॉमी सेंटर एक्सीलेंस यदि आपको यह जानकारी उपयोगी लगे, तो फोटो के नीचे दिए पीले अंगूठे के निशान पर क्लिक करें और नीचे दिए विकल्पों के माध्यम से अपने सभी किसान मित्रों के साथ साझा करें।
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