खेती का इतिहासएग्रोस्टार एग्रोनोमी सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस
खेत और बैल का रिश्ता!
🐂🐂भारत समेत दुनिया में आज भी खेती और पशुपालन ही सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले क्षेत्र हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था केवल खेती-किसानी से ही नहीं, पशुपालन और छोटे-छोटे लघु-कुटीर उद्योग व लघु व्यवसायों से संचालित होती रही है। मवेशी एक तरह से लोगों के फिक्स्ड डिपॉजिट हुआ करते थे, जिन्हें बहुत जरूरत पड़ने पर वे बेच देते थे। लेकिन आम तौर पर गाय-बैल और मनुष्य के आपसी स्नेह और प्यार की कई कहानियां अब भी प्रचलन में हैं। उनके प्रति गहरी संवेदनशीलता भी देखने में आती थी। उन्हें बड़े लाड़-प्यार से पाला पोसा जाता था। पिपरिया के मूलचंद दादा कहते हैं हम मवेशियों को अपने बच्चे की तरह पालते-पोसते हैं। उन्हें भी मनुष्यों की तरह बुढ़ापे में खूंटे पर बांधकर खिलाना चाहिए। 🐂🐂बैलों के प्रति विशेष प्रेम तब दिखाई देता है जब उन्हें दीपावली के समय रंग-बिरंगी फीते, गेंठा, मुछेड़ी, नाथ और पट्टों से सजाया जाता है। मढ़ई-मेलों में बैलगाड़ी से लोग सपरिवार जाते हैं। नर्मदा के मेलों में सजे बैलों की छटा निराली दिखती थी। गाय-बैल अपने आपको ऐसा ढाल लेते हैं कि कई तो खुद ही खेतों या जंगल में चरकर खुद घर आ जाते हैं। उन्हें लाने-ले जाने की भी जरूरत नहीं पड़ती। अगर वे कहीं दूर हो तो उनके गले की टपरी या ढूने की आवाज सुनकर उनको हांक कर घर ले आते हैं। गाय की पूजा की जाती है। उन्हें अनाज खिलाया जाता है। यानी गाय-बैल को समान रूप से सम्मान मिलता था। 🐂🐂पशु शक्ति के बारे में कई विशेषज्ञ व वैज्ञानिक भी यह मानने लगे हैं कि यह सबसे सस्ता व व्यावहारिक स्रोत है। मशीनीकरण से ग्लोबल वार्मिंग की समस्या बढ़ेगी, जो आज दुनिया में सबसे चिंता का विषय है। कुछ किसानों ने खेती में पशुओं के महत्व को देखते हुए फिर से बैलों की खेती करना शुरू भी कर दिया है। हालांकि यह प्रयास छुट-पुट है, लेकिन सही दिशा में उठाए गए सही कदम हैं। 🐂🐂हल-बैल की जगह ट्रैक्टर की जुताई से मिट्टी भी सख्त (भट्टल) हो रही है। जमाड़ा गांव के जीवन सिंह कहते हैं कि अगर गीले खेत में से एक भैंस निकल जाए तो जहां-जहां उसके खुरों के निशान बन जाते हैं, वहां-वहां दाने नहीं उगते। फिर तो अब ट्रैक्टर से जुताई की जा रही है। उसका वजन तो बहुत ज्यादा होता है। इससे हमारी जमीन कड़ी हो रही है। हल से जुताई की यह समस्या नहीं आती थी। कुल मिलाकर, खेती और पशुपालन का रिश्ता आज टूट रहा है। लेकिन अगर इसको बरकरार रखा जाए तो न केवल हमें भूमि को उर्वर बनाने के लिए गोबर खाद मिलेगी। बल्कि बड़ी आबादी को रोजगार भी मिलेगा। पशु शक्ति के बारे में कई विशेषज्ञ व वैज्ञानिक भी यह मानने लगे हैं कि यह सबसे सस्ता व व्यावहारिक स्रोत है। मशीनीकरण से ग्लोबल वार्मिंग की समस्या बढ़ेगी, जो आज दुनिया में सबसे चिंता का विषय है। कुछ किसानों ने खेती में पशुओं के महत्व को देखते हुए फिर से बैलों की खेती करना शुरू भी कर दिया है। हालांकि यह प्रयास छुट-पुट है, लेकिन सही दिशा में उठाए गए सही कदम हैं। स्त्रोत:- एग्रोस्टार एग्रोनोमी सेंटर ऑफ एक्सीलेंस 👉किसान भाइयों ये जानकारी आपको कैसी लगी? हमें कमेंट करके ज़रूर बताएं और लाइक एवं शेयर करें धन्यवाद!
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