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अक्षय तृतीया - कृषि सभ्यता और मानसून के पूर्वानुमान का पर्व!
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अक्षय तृतीया - कृषि सभ्यता और मानसून के पूर्वानुमान का पर्व!
👉🏻अक्षय तृतीया जिसे स्थानीय भाषा में ‘अखा तीज’ भी कहा जाता है,भारत की कृषि सभ्यता और मानसूनों के पूर्वानुमान का भी महत्त्वपूर्ण पर्व है. ‘अक्षय’ शब्द का अर्थ है जिसका कभी नाश नहीं होता.हेमाद्रि के कथनानुसार अक्षय तृतीया के दिन किए गए स्नान, दान,जप, होम,स्वाध्याय और पितृतर्पण का फल अक्षय हो जाता है। 👉🏻खेती के कारोबार से जुड़े कृषक समुदाय के लिए उनका परम आराध्य देव अनुकूल वर्षा की कृपा से प्राप्त अन्न होता है.वे इसी अन्न को उगाने के लिए पूरे वर्ष कृषिकर्म का अनुष्ठान करते हैं, इसलिए ‘अक्षय तृतीया’ कृषि कर्म को भी अक्षय फल से जोड़ने वाली महत्त्वपूर्ण तिथि है.अक्षय तृतीया के दिन आकाशीय नक्षत्रों और प्राकृतिक निमित्तों का फल भी स्थायी प्रभाव वाला माना जाता है. अतएव परम्परागत कृषि पर निर्भर रहने वाला कृषक समुदाय इस दिन अनुकूल वर्षा और अच्छी फसल की कामना से मानसूनों की संभावनाओं का विशेष परीक्षण करता है.मालवा का कृषक समुदाय अक्षय तृतीया के दिन नए घड़े में जल भरकर और उसे आम के पत्तों तथा ऋतुफलों से सजा कर कृषि कार्य का शुभारम्भ करता है। 👉🏻किसान अक्षय तृतीया के दिन अच्छी वर्षा की कामना से शकुन गीत गाते हैं और सात प्रकार के अनाजों से कृषि देवी की पूजा की जाती है। 👉🏻भारत के प्राचीन मौसमवैज्ञानिक अक्षय तृतीया को वायु का परीक्षण करके वर्षा का पूर्वानुमान करने में दक्ष थे. अक्षय तृतीया से लेकर पांच-छह दिनों तक लगातार तेज हवा का चलना अनाज की कमी और तृतीया और चतुर्थी को वर्षा का होना अल्प वर्षा का सूचक माना गया है. मानसूनी वर्षा के पूर्वानुमान हेतु अक्षय तृतीया को संध्याकाल के समय किसी वृक्ष के नीचे सात प्रकार के अनाजों को मुट्ठी भर रखा जाता है.रखते हुए जो अनाज फैल जाए उसके पैदावार की पर्याप्त मात्र में संभावना की जाती है और जो अनाज इकट्ठा रहे उसकी फसल कम होने का अनुमान लगाया जाता है। स्रोत:- Agrostar, 👉🏻किसान भाइयों ये जानकारी आपको कैसी लगी? हमें कमेंट करके ज़रूर बताएं और लाइक एवं शेयर करें धन्यवाद।
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