सलाहकार लेखएग्रोस्टार एग्रोनोमी सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस
अरंडी की फसल में सिंचाई प्रबंधन!
खेती के लिए बारिश का पानी ही पर्याप्त होता है लेकिन जब अधिक समय तक सुखा हो तब फसल वृद्धि की अवस्था में पहले क्रम के स्पाइकों के विकास या दुसरे क्रम के स्पाइकों के निकलने/विकास के समय एक संरक्षी सिंचाई करें जिससे उपज अच्छी होती हैं। अरंडी खरीफ में उगायी जाने वाली फसल है। जहाँ समय समय पर वर्षा होती रहती है।अरंडी की जड़ें, अधिक गहराई से भी नमी का शोषण कर लेती हैं। वर्षा काल में बुवाई के 45 से 60 दिनों तक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। अगर पहले पानी दे देते हैं तो जड़े ऊपर रह जाती हैं व गहराई में नहीं जा पाती है। इसलिए पहला पानी आवश्यक हो तभी दें, ताकि जड़ों का अच्छा विकास हो सके, इसके बाद आवश्यकतानुसार 18 से 20 दिनों के अन्तराल पर सिंचाई करते रहें। अरंडी में बूंद-बूंद विधि द्वारा सिंचाई करने के लिये खेत में ड्रिप पाइप की मुख्य लाइन के दोनों तरफ 120 सेंटीमीटर की दूरी पर छेद कर 50 से 50 मीटर लम्बी ड्रिप लाइनें खेत में डाल दी जाती हैं। ड्रिप लाइनों के अन्दर 60 सेंटीमीटर की दूरी पर ड्रिपर लगाते हैं और उन्ही ड्रिप के पास अरंडी के बीज की बुवाई करते है या अरंडी के बीजों की सीड़ ड्रिल से बुवाई कर देते हैं और बीज बुवाई वाली लाइन पर ड्रिप पाइप रख देते हैं। इसके बाद बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति से 3 दिन के अन्तराल पर पानी देते हैं। ड्रिप लाइनें 16 मिलीमीटर व्यास की तथा 1.25 किलोग्राम प्रति सेंटीमीटर का दबाव रखकर 4 लीटर पानी प्रति ड्रिपर प्रति घण्टा की सप्लाई दें। इस तरीके से अगस्त माह में 0.5 घण्टा, सितम्बर व अक्टुबर में 1.5 घण्टा, नवम्बर, दिसम्बर और जनवरी में 0.5 से 0.75 घण्टा व फरवरी, मार्च में 1.5 से 2 घण्टा सिंचाई करें। बूंद-बूंद सिंचाई विधि में पानी की बचत 35 प्रतिशत व उत्पादन में भी सार्थक वृद्धि होती है। साथ ही खरपतवार, कीट और रोगों का प्रकोप भी कम होता है।
स्रोत:- एग्रोस्टार एग्रोनोमी सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, प्रिय किसान भाइयों दी गई जानकारी उपयोगी लगी, तो इसे लाइक 👍 करें एवं अपने अन्य किसान मित्रों के साथ शेयर करें धन्यवाद!
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