सलाहकार लेखउत्तर प्रदेश कृषि विभाग
गेहूँ की मेंड़ पर बुआई (बेड प्लान्टिग)!
इस तकनीकी द्वारा गेहूँ की बुआई के लिए खेत पारम्परिक तरीके से तैयार किया जाता है और फिर मेड़ बनाकर गेहूँ की बुआई की जाती है। इस पद्धति में एक विशेष प्रकार की मशीन (बेड प्लान्टर) का प्रयोग नाली बनाने एवं बुआई के लिए किया जाता है। मेंडों के बीच की नालियों से सिचाईं की जाती है तथा बरसात में जल निकासी का काम भी इन्ही नालियों से होता है एक मेड़ पर 2 या 3 कतारो में गेंहूँ की बुआई होती है। इस विधि से गेहूँ की बुआई कर किसान बीज खाद एवं पानी की बचत करते हुये अच्छी पैदावार ले सकते है। इस विधि में हम गेहूँ की फसल को गन्ने की फसल के साथ अन्तः फसल के रूप में ले सकते है इस विधि से बुआई के लिए मिट्टी का भुरभुरा होना आवश्यक है तथा अच्छे जमाव के लिए पर्याप्त नमी होनी चाहिये। इस तकनीक की विशेषतायें एवं लाभ इस प्रकार है:- 1. इस पद्धति में लगभग 25 प्रतिशत बीज की बचत की जा सकती है। अर्थात 30-32 किलोग्राम बीज एक एकड़ के लिए प्रर्याप्त है। 2. यह मशीन 70 सेन्टीमीटर की मेड़ बनाती है जिस पर 2 या 3 पंक्तियों में बोआई की जाती है। अच्छे अंकुरण के लिए बीज की गहराई 4 से 5 सेन्टीमीटर होनी चाहिये। 3. मेड़ उत्तर –दक्षिण दिशा में होनी चाहिये ताकि हर एक पौधे को सूर्य का प्रकाश बराबर मिल सके। 4. इस मशीन की कीमत लगभग 70,000 रूपये है। 5. इस पद्धति से बोये गये गेहूँ में 25 से 40 प्रतिशत पानी की बचत होती है। यदि खेत में पर्याप्त नमी नहीं हो तो पहली सिचाई बोआई के 5 दिन के अन्दर कर देनी चाहिये। 6. इस पद्धति में लगभग 25 प्रतिशत नत्रजन भी बचती है अतः 48 किलोग्राम नत्रजन, 24 किलोग्राम फास्फोरस तथा 16 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़ पर्याप्त होता है। मेंड़ पर बोआई द्वारा फसल विविधिकरण:- गेहूँ के तुरन्त बाद पुरानी मेंड़ो को पुनः प्रयोग करके खरीफ फसल में मूंग, मक्का, सोयाबीन, अरहर, कपास आदि की फसलें उगाई जा सकती है। इस विधि से दलहन एवं तिलहन की 15 से 20 प्रतिशत अधिक पैदावार मिलती है।
स्रोत:- उत्तर प्रदेश कृषि विभाग, प्रिय किसान भाइयों दी गई जानकारी उपयोगी लगी, तो इसे लाइक करें एवं अपने अन्य किसान मित्रों के साथ शेयर करें धन्यवाद!
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