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AgroStar Krishi Gyaan
Pune, Maharashtra
02 Dec 19, 10:00 AM
सलाहकार लेखएग्रोस्टार एग्रोनोमी सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस
मटर में एकीकृत कीट एवं रोग प्रबंधन
मटर के प्रमुख कीट माँहू: इस कीट के शिशु एवं वयस्क दोनों पौधों के कोमल भागों से रस चूसकर हानि पहुँचाते हैं। इस कीट के आक्रमण के उपरान्त पत्तियों पर काले-काले धब्बे बन जाते हैं। जिसका प्रभाव पौधों की वृद्धि और उपज पर पड़ता है।
प्रबंधन: 1.पौधे के तने अथवा अन्य भाग जहाँ माहू दिखाई दें उसको तोड़कर नष्ट कर दें। 2.नीम तेल 1500 पीपीएम 1 लीटर प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में घोलकर 10 दिनो के अन्तराल पर छिड़काव करें। 3.अधिक प्रकोप की अवस्था मे थायोमिथोक्साम 25% डब्ल्यूजी @40 ग्राम प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। पत्ती सुरंग कीट: यह कीट पौध वृद्धि अवस्था में ज्यादा हानिकारक होता है। इस कीट की मैगट पत्तियों में टेड़े-मेढ़े सुरंग बनाकर पत्तियों के हरे भागों को खाकर नष्ट कर देती है। प्रबंधन: 1.इस कीट के नियंत्रण के लिए 4 प्रतिशत नीम गिरी चूर्ण का छिड़काव (40 ग्राम नीम गिरी चूर्ण प्रति लीटर पानी) लाभकारी पाया गया है। 2.अधिक प्रकोप की अवस्था मे इमिडाक्लोप्रिड 17.8% @ एसएल 40 मिली प्रति एकड़ 200 लीटर पानी या थायोमिथोक्साम 25% डब्ल्यूजी @ 40 ग्राम प्रति एकड़ 200 लीटर में घोलकर 10 से 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए। मटर के प्रमुख रोग भभूतिया या छाछया रोग: इस रोग से तना, पत्तियां तथा फलियाँ प्रभावित होती हैं। प्रभावित स्थान पर हल्के दाग बनते हैं, जो बाद में, सफेद पाउडर के रूप में बढ़कर एक दूसरे से मिल जाते हैं और धीरे-धीरे पूरी की पूरी पत्ती एवं पौधा सफेद चूर्ण से ढ़ँक जाता है एवं बाद में पत्तियां गिर जाती हैं। प्रबंधन:1.रोगरोधी किस्मों के चयन करें। 2.प्रकोप के शुरुआत में सल्फर 80% डब्ल्यूजी @ 500 ग्राम प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करें। उकठा: मटर की यह फफूँदजनित बीमारी है। प्रभावित पत्तियाँ पीली पड़ जाती है एवं पौधा सूख जाता है। प्रबंधन: 1.उकटा रोग की रोकथाम के लिए बुआई के पूर्व बीज को थायरम 2 ग्राम + कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम प्रति किलो बीज या ट्राइकोडर्मा 4 ग्राम + बीटावैक्स 2 ग्राम/किलो की दर से उपचारित करके ही बुवाई करनी चाहिए। 2.उकटा रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन करना चाहिए। 3.खड़ी फसल में रोग की रोकथाम के लिये कार्बेन्डाजिम 50% डब्ल्यूपी @ 200 ग्राम प्रति एकड़ 200 लीटर पानी मे घोलकर जड़ क्षेत्र में मृदा में दें। स्रोत: एग्रोस्टार एग्रोनॉमी सेंटर एक्सीलेंस यदि आपको यह जानकारी उपयोगी लगे, तो फोटो के नीचे दिए पीले अंगूठे के निशान पर क्लिक करें और नीचे दिए विकल्पों के माध्यम से अपने सभी किसान मित्रों के साथ साझा करें।
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